होम्‍योपैथी चिकित्‍सा

होम्‍योपैथी चिकित्‍सा विज्ञान के जन्‍मदाता डॉ. क्रिश्चियन फ्राइडरिक सैम्यूल हानेमान है। यह चिकित्सा के 'समरूपता के सिंद्धात' पर आधारित है जिसके अनुसार औषधियाँ उन रोगों से मिलते जुलते रोग दूर कर सकती हैं, जिन्हें वे उत्पन्न कर सकती हैं। औषधि की रोगहर शक्ति जिससे उत्पन्न हो सकने वाले लक्षणों पर निर्भर है। जिन्हें रोग के लक्षणों के समान किंतु उनसे प्रबल होना चाहिए। अत: रोग अत्यंत निश्चयपूर्वक, जड़ से, अविलंब और सदा के लिए नष्ट और समाप्त उसी औषधि से हो सकता है जो मानव शरीर में, रोग के लक्षणों से प्रबल और लक्षणों से अत्यंत मिलते जुलते सभी लक्षण उत्पन्न कर सके।

अष्टांगिक आयुर्वेद

अष्टांगिक आयुर्वेद

प्राचीन कालमें आयुर्वेद मेंआठ शाखाओं का विकास हुआ, जिसके कारण इसे अष्टांग आयुर्वेद कहा जाता था I वर्तमान में अध्धयन की द्रष्टि से इनके अतिरिक्त अन्य शाखाओं का भी विकास हुआ है I आयुर्वेद की प्राचीन आठ शाखाएं निम्नलिखित है -

1-कायचिकित्सा (इंटरनल मेडिसिन)

2-कौमारभृत्य (पीडियाट्रिक्स)

3-ग्रह चिकित्सा (साइक्येट्री)

4-शालाक्य (आई.एंड.ई.एन.टी)

5-शल्य चिकित्सा (सर्जरी)

6-विष चिकित्सा (टाक्सिकोलोजी)

7-रसायन चिकित्सा (गेरिएट्रिक्स)

8-वाजीकरण ( वैटेलिटी)

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