समाधि और उसके भेद

समाधि और उसके भेद

समाधि ‘‘तदेवार्थमात्रनिर्भीसं स्वरूपशून्यमिव समाधि।।’’68 जब ध्यान में केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीति होती है, और चित्त का निज स्वरूप शून्य-सा हो जाता है तब वही (ध्यान ही) समाधि हो जाता है। ध्यान करते-करते जब चित्त ध्येयाकार में परिणत हो जाता है, उसके अपने स्वरूप का अभाव सा हो जाता है, उसको ध्येय से भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ध्यान का ही नाम समाधि हो जाता है। समाधि के दो भेद होते हैं- (1) सम्प्रज्ञात समाधि (2) असम्प्रज्ञात समाधि। सम्प्रज्ञात समाधि के चार भेद हैं- (1) वितर्कानुगत (2) विचारानुगत (3) आनन्दानुगत (4) अस्मितानुगत। (1) वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि :- भावना द्वारा ग्राहय रू

योग विद्या का प्रारम्भ एवं योग के प्रथम वक्ता

 योग के प्रथम वक्ता

वेद सर्व सत्य विधाओं की पुस्तक है। मानवीय जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान वेद में निबद्ध है। यह मान्यता सर्वविदित है। सब सत्य विधाओं में प्रमुखरूपेण ब्रह्मविद्या-अध्यात्मविद्या है, यह भी सर्वगत है। अतः सिद्ध होता है कि वेद का ब्रह्मविद्या अर्थात योग विद्या से घनिष्ठ सम्बन्ध है। कुछ स्थूल दृष्टि सम्पन्न व्यक्तियों का यह मानना है कि ऋग्वेद के प्रथम नव मण्डलों के अनुसन्धान से इस बात की पुष्टि होती है कि प्रारम्भ में आर्य इस संसार के आनन्द में पूर्णरूपेण लीन थे एवं भौतिक सुख की कामना पूर्ति हेतु वे देवी देवताओं की पूजा-अर्चना यज्ञादि कर्म किया करते थे। उनकी यह मान्यता निराधार है। वेद का मुख्य

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