गीता में योग

गीता में योग

गीता में योग की अवधारणा गीता जो कि महाभारत का एक अंग है। वह वास्तव में सम्पूर्ण योग ग्रन्थ है। गीता में योग शब्द का व्यवहार आत्मा का परमात्मा से मिलन के अर्थ में किया गया है। योग का व्यवहार गीता में विस्तृत अर्थ में किया गया है। योग-दर्शन में योग का अर्थ ‘चित्त-वृत्तियों का निरोध है’। परन्तु गीता में योग का व्यवहार ईश्वर से मिलन के अर्थ में किया गया है। गीता वह विद्या है जो आत्मा को ईश्वर से मिलाने के लिए अनुशासन तथा भिन्न-भिन्न मार्गां का उल्लेख करती है। गीता का मुख्य उपदेश योग है इसीलिए गीता को योग शास्त्र कहा जाता है। जिस प्रकार मन के तीन अंग हैं- ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक। इसील

वेदों मे योगांगों का स्वरूप

वेदों मे योगांगों का स्वरूप

वेदों मे योगांगों का स्वरूप:-
    वेदों के परिशीलन से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि पात´्जल योगदर्शन की भाँति योगांगों का संकलित स्वरूप वेदों मंे प्रतिपादित नहीं किया गया हैै। अथर्ववेदीय मन्त्र में प्रयुक्त ‘‘अष्टधा’’, ‘‘अष्टायोगेः’’ पदों का अर्थ भाष्यकार क्षमकरणदास त्रिवेदी ने पात´्जल-योग में निर्दिष्ट यम-नियम आदि अष्ट योगांगों को ग्रहण किया है।

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