योग दर्शन

योग सिद्धियाँ

योग सिद्धियाँ

योगसाधना से प्राप्त सिद्धियाँ योग साधना के मार्ग में भिन्न-भिन्न विषयों पर संयम करने से तत्सम्बन्धित अनेक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, वे सिद्धियाँ साधक द्वारा त्याज्य है, इस सत्य का बोध कराने के लिये सूत्रकार ने विभूति पाद में इन सिद्धियों का वर्णन करके अन्त में उन्हें हेय बताया है। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण सिद्धियों का परिचय यह दिया जा रहा है। विषयों के ग्राह्य, ग्रहण एवं ग्रहीतृ रूप होने से, उनसे सम्बद्ध संयम की सिद्धियाँ भी तीन प्रकार की होती हैं। जो इस प्रकार हैं। (क) ग्राह्य संयम जनित सिद्धियाँ :- ‘‘स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजयः।।़70 अर्थात् (भूतों की) स्थूल, स्वरूप सू

समाधि और उसके भेद

समाधि और उसके भेद

समाधि ‘‘तदेवार्थमात्रनिर्भीसं स्वरूपशून्यमिव समाधि।।’’68 जब ध्यान में केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीति होती है, और चित्त का निज स्वरूप शून्य-सा हो जाता है तब वही (ध्यान ही) समाधि हो जाता है। ध्यान करते-करते जब चित्त ध्येयाकार में परिणत हो जाता है, उसके अपने स्वरूप का अभाव सा हो जाता है, उसको ध्येय से भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ध्यान का ही नाम समाधि हो जाता है। समाधि के दो भेद होते हैं- (1) सम्प्रज्ञात समाधि (2) असम्प्रज्ञात समाधि। सम्प्रज्ञात समाधि के चार भेद हैं- (1) वितर्कानुगत (2) विचारानुगत (3) आनन्दानुगत (4) अस्मितानुगत। (1) वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि :- भावना द्वारा ग्राहय रू

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