योग दर्शन

वेदों मे योगांगों का स्वरूप

वेदों मे योगांगों का स्वरूप

वेदों मे योगांगों का स्वरूप:-
    वेदों के परिशीलन से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि पात´्जल योगदर्शन की भाँति योगांगों का संकलित स्वरूप वेदों मंे प्रतिपादित नहीं किया गया हैै। अथर्ववेदीय मन्त्र में प्रयुक्त ‘‘अष्टधा’’, ‘‘अष्टायोगेः’’ पदों का अर्थ भाष्यकार क्षमकरणदास त्रिवेदी ने पात´्जल-योग में निर्दिष्ट यम-नियम आदि अष्ट योगांगों को ग्रहण किया है।

वेदों में योग विद्या

वेदों में योग का स्वरूप

वेदों में योग का स्वरूप
    वेद सर्व सत्य विद्याओं की पुस्तक है। मानवीय जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान वेद में निबद्ध है। यह मान्यता सर्ववदित है। सब सत्य विद्याओं में प्रमुख रूपेण ब्रह्मविद्या आध्यात्मविद्या है, यह भी सर्वमत है। अतः स्पष्ट है कि वेद का ब्रह्मविद्या अर्थात योग-विद्या से घनिष्ठ सम्बन्ध हैै।

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