योग दर्शन

योग विद्या का प्रारम्भ एवं योग के प्रथम वक्ता

 योग के प्रथम वक्ता

वेद सर्व सत्य विधाओं की पुस्तक है। मानवीय जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान वेद में निबद्ध है। यह मान्यता सर्वविदित है। सब सत्य विधाओं में प्रमुखरूपेण ब्रह्मविद्या-अध्यात्मविद्या है, यह भी सर्वगत है। अतः सिद्ध होता है कि वेद का ब्रह्मविद्या अर्थात योग विद्या से घनिष्ठ सम्बन्ध है। कुछ स्थूल दृष्टि सम्पन्न व्यक्तियों का यह मानना है कि ऋग्वेद के प्रथम नव मण्डलों के अनुसन्धान से इस बात की पुष्टि होती है कि प्रारम्भ में आर्य इस संसार के आनन्द में पूर्णरूपेण लीन थे एवं भौतिक सुख की कामना पूर्ति हेतु वे देवी देवताओं की पूजा-अर्चना यज्ञादि कर्म किया करते थे। उनकी यह मान्यता निराधार है। वेद का मुख्य

गीता में योग

गीता में योग

गीता में योग की अवधारणा गीता जो कि महाभारत का एक अंग है। वह वास्तव में सम्पूर्ण योग ग्रन्थ है। गीता में योग शब्द का व्यवहार आत्मा का परमात्मा से मिलन के अर्थ में किया गया है। योग का व्यवहार गीता में विस्तृत अर्थ में किया गया है। योग-दर्शन में योग का अर्थ ‘चित्त-वृत्तियों का निरोध है’। परन्तु गीता में योग का व्यवहार ईश्वर से मिलन के अर्थ में किया गया है। गीता वह विद्या है जो आत्मा को ईश्वर से मिलाने के लिए अनुशासन तथा भिन्न-भिन्न मार्गां का उल्लेख करती है। गीता का मुख्य उपदेश योग है इसीलिए गीता को योग शास्त्र कहा जाता है। जिस प्रकार मन के तीन अंग हैं- ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक। इसील

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