वेदों मे योगांगों का स्वरूप

वेदों मे योगांगों का स्वरूप

वेदों मे योगांगों का स्वरूप:-
    वेदों के परिशीलन से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि पात´्जल योगदर्शन की भाँति योगांगों का संकलित स्वरूप वेदों मंे प्रतिपादित नहीं किया गया हैै। अथर्ववेदीय मन्त्र में प्रयुक्त ‘‘अष्टधा’’, ‘‘अष्टायोगेः’’ पदों का अर्थ भाष्यकार क्षमकरणदास त्रिवेदी ने पात´्जल-योग में निर्दिष्ट यम-नियम आदि अष्ट योगांगों को ग्रहण किया है।

यूनानी चिकित्सा

यूनानी चिकित्सा पद्धति भारतीय चिकित्सा विधि का ही एक रूप है। कफ़, बलगम, पीला पित्त (सफ़रा) और काला पित्त (सौदा) प्रधानता के आधार पर रोग के लक्षणों का पता किया जाता है। भारतीय चिकित्सा दर्शन के करीब माना जाता है। मानव शरीर में आग, जल, पृथ्वी और वायु प्रधानता का मानव शरीर पर प्रभाव ही मूल रोग लक्षण और निदान देखा गया है। यूनानी चिकित्सा के अनुयायियों के अनुसार इन तत्वों के विभिन्न तरल पदार्थ में और उनके शेष राशि की उपस्थिति से स्वास्थ्य के असंतुलन का सुराग लगता है। इन पदार्थो का प्रत्येक आदमी में अनूठा मिश्रण उसके स्वभाव और रक्त की विशेषता तय करता है। कफ की प्रधानता वाला व्यक्ति ठंडे स्वभाव का

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